कृषि विकास की समस्यायें एवं संभावनाएँ: जनपद जौनपुर (.प्र.) का एक भौगोलिक अध्ययन

 

रोहित चैरसिया1, महीप चैरसिया2

1छात्र, भूगोल विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज (.प्र.)

2शोध छात्र, भूगोल विभाग, नागरिक पी.जी. काॅलेज, जंघई, जौनपुर (.प्र.)

*Corresponding Author E-mail:  mahipcharasia66@gmail.com

 

सरांष

अध्ययन क्षेत्र जनपद जौनपुर में भूमि ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है, जिसका दोहन विभिन्न सामाजिक-आर्थिक क्रियाओं में हजारों वर्षों से किया जाता रहा है। यहाँ सम्पूर्ण आर्थिक तंत्र के केन्द्र में भूमि आधारित कृषि है, जिससे किसान इस प्रकार आबद्ध है कि उससे हटकर उसका कल्याण सम्भव नहीं है। फलस्वरूप समुचित कृषि सुधार के द्वारा ही ऐसी परिस्थितियाँ पैदा की जा सकती हैं, जिससे क्षेत्र का विपन्न किसान अपनी आर्थिक एवं सामाजिक दशा में सुधार कर सकता है। इसलिए क्षेत्र में ऐसी भू वैन्यासिक संगठन और समन्वित विकास योजना की आवश्यकता है, जिससे क्षेत्र में रोजगार प्राप्ति की सुविधा और आय में वृद्धि की सम्भावना हो। इसके लिए जहाँ एक ओर प्राकृतिक विपदाओं पर नियंत्रण आवश्यक है, तो दूसरी ओर कृषि अर्थव्यवस्था में नवीन तकनीकों एवं वैज्ञानिक प्राविधियों के प्रयोग से उत्पादन में अभिवृद्धि, कृषि का व्यापक व्यापारीकरण तथा उसमें विविधता उत्पन्न करने की आवश्यकता है, जिससे क्षेत्र के निवासियों को स्वास्थ्यप्रद भोज्य पदार्थ एवं जीवन की अन्य सुविधायें प्रदान की जा सके। इससे जहाँ एक ओर भूमि के दुरूपयोग में कमी होगी, तो दूसरी ओर उसमें क्षेत्र की बढ़ती जनसंख्या के अधिभार को सहन करने की क्षमता में वृद्धि होगी, जिससे जनपद आत्मनिर्भर होकर कालान्तर में अन्य क्षेत्रों को अपने उत्पादनों का लाभ दे सकेगा। प्रस्तुत शोध पत्र में द्वितीय तथा तृतीयक स्रोत से प्राप्त आँकड़ों का प्रयोग एवं सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक तथ्यों को स्पष्ट करने के लिए क्षेत्र में भौतिक तथा सांस्कृतिक मानचित्रों तालिकाओं का प्रयोग यथास्थान पर हुआ है। प्रस्तुत शोध पत्र व्याख्यात्मक एवं विश्लेषणात्मक अनुसंधान पर आधारित है।

eq[;'kCn % कृषि विकास, नियोजन, फसल प्रतिरूप, ग्रामीण विकास।


 

 

प्रस्तावना:

समन्वित क्षेत्रीय विकास की अवधारणा परस्पर सम्बन्धित कार्यात्मक तथा क्षेत्रीय समन्वय की संकल्पना पर आधारित है, जिसमें विकेन्द्रीकरण के आधार पर ग्रामीण एवं नगरीय विकास के समन्वय रूप को प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है। ग्रामीण नियोजन की क्षेत्रीय इकाई कार्योपलक्षीय अन्योन्य क्रिया द्वारा निर्धारित एक सम्बद्ध इकाई होती है तथा सेवा केन्द्र ऐसी इकाई का केन्द्र होता है। अतः ऐसे सेवा केन्द्रों का चयन न्यूनतम लागत अथवा अधिकतम लाभ को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। कृषि विकास से सम्बन्धित अनेकानेक संस्थाएं उन्हीं सेवा केन्द्रों के माध्यम से ग्रामीणों को उपलब्ध होती है और साथ ही ऐसे केन्द्र प्राथमिक उत्पादन प्रधान ग्रामीण क्षेत्र तथा द्वितीयक उत्पादन प्रधान नगरीय क्षेत्र के बीच संयोजक की भूमिका का काम करते हैं। कृषि कार्यक्रमों को आधुनिक बनाने में तथा श्रेयस्कर विकासशील वातावरण तैयार करने में इनकी अहम भूमिका होती है, ताकि उससे अधिकतम लाभ मिल सके। स्पष्ट है कि लाभ की प्राप्ति केवल उत्पादन से नहीं, बल्कि उसके उचित विक्रय से भी सम्बद्ध है और यह कार्य ग्रामीण सेवा केन्द्र ही सम्पादित कर सकते हैं। भूमि उपयोग के सुधार के लिए अनेकानेक अभिनव प्रयोग किये गये हैं, फिर भी भूमि के संतुलित उपयोग द्वारा ऐच्छिक परिणाम अध्ययन क्षेत्र में अब तक प्राप्त नहीं हो सका है।

 

अध्ययन क्षेत्र:

जौनपुर जनपद, Ÿारप्रदेष का एक प्रमुख ऐतिहासिक शहर है, यह वाराणसी प्रभाग के Ÿार पष्चिमी भाग में स्थित है। इसका विस्तार 24024’ से 26012’ अक्षांष और 8207’म् से 8305’म् देषांतर के बीच है (चित्र-1) गोमती और सई मुख्य नदियाँ हंै मिट्टी मुख्य रूप से रेतीली, चिकनी बलुई है। जनपद में खनिजों की कमी है। जिले का भौगोलिक क्षेत्रफल 2038 वर्ग कि.मी. है। जौनपुर जिले की वास्तविक जनसंख्या 4,476,072 हैं, जिसमें 2,217,635 पुरूष तथा 2,258,437 महिला जनसंख्या है। जनसंख्या घनत्व 1113 व्यक्ति प्रतिवर्ग कि.मी. है। साक्षरता 73.66 प्रतिषत है, जिसमें 86.06 प्रतिषत पुरूष तथा 61.7 प्रतिषत महिलाएँ साक्षर है। जिले में लिंगानुपात 1024 है जोकि भारत में 1000 पुरूषों पर 940 महिलाओं की तुलना में अधिक है। 93 प्रतिषत जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है जिनकी आजीविका का मुख्य साधन कृषि और कृषि आधारित उद्योग है।

 

चित्र - 1

 

चित्र - 2

 

शोध अध्ययन का उद्देष्य:

1. कृषि और कृषि आधारित उद्योगों की स्थिति का आंकलन करना।

2. अध्ययन क्षेत्र में कृषि विकास की समस्याओं को ज्ञात करना और प्रतिक्रया आधारित सुझावों को प्रस्तावित करना।

3. क्षेत्र में कृषि विकास की संभावनाओं को ज्ञात करना।

 

आँकड़ा स्रोत तथा शोध विधि तंत्र:

प्रस्तुत शोध पत्र व्याख्यात्मक और विष्लेषणात्मक अनुसंधान पर आधारित है। इसके अन्र्तगत पूर्व निर्धारित परिकल्पनाओं का तात्कालिक परिस्थितियों के संदर्भ में परीक्षण किया गया है। प्रस्तुत शोध पत्र में द्वितीयक एवं तृतीयक स्रोतों से प्राप्त आँकड़ों का प्रयोग किया गया है। तथ्यों को स्पष्ट करने के लिये अध्ययन क्षेत्र का भौतिक एवं सांस्कृतिक मानचित्रों तालिकाओं का प्रयोग किया गया है तथा अन्य सामाजिक, आर्थिक तथ्यों को स्पष्ट करने के लिए जिला सांख्यिकीय पत्रिका 2018, राष्ट्रीय जनगणना 2011 तथा जिला हथकरघा कार्यालय तहसील और विकासखण्ड कार्यालय से प्राप्त आँकड़ों का प्रयोग किया गया है।

 

परिणाम एवं परिचर्चा:

अध्ययन क्षेत्र जनपद जौनपुर में भूमि उपयोग कृषि उत्पादन, जनसंख्या भार, कृषि की क्षमता एवं पोषण स्तर आदि तत्वों में हुए परिवर्तनों के अध्ययन एवं विश्लेषण से यह स्पष्ट हो जाता है कि क्षेत्र के सीमित भूमि संसाधन पर दिनों-दिन गति से बढ़ती जनसंख्या का भार बढ़ता जा रहा है, जिसके फलस्वरूप भूमि का अनुचित दोहन बढ़ रहा है तथा क्षेत्र की जनसंख्या का आर्थिक विकास एवं उनकी जीवन स्तर सुधारने के स्थान पर गिरता जा रहा है, क्योंकि जिस गति से आवश्यकताएं बढ़ रही हैं, उस गति से कृषि आय में वृद्धि नहीं हो पा रही है। पूर्वांचल के इस पिछड़े जनपद में बिना कृषि के आधुनिकीकरण किए विकास की कल्पना करना एक दिवास्वप्न है। कृषि के आधुनिकीकरण के लिए विभिन्न प्रकार की सेवायें प्रदान करना तथा ग्रामीण क्षेत्र में एक श्रेयस्कर के सृजन के साथ ही उत्पादों को बाजार प्रदान करना तथा नगरोन्मुख प्रवास की प्रवृत्ति को नियन्त्रित करना इसका मुख्य उद्देश्य है। जनपद जौनपुर में प्राकृतिक आपदाओं, यथा- बाढ़, सूखा, जल-जमाव, नदी मार्ग परिवर्तन के रूप में जहाँ एक ओर अनेक प्राकृतिक समस्यायें हैं, वहीं भूमि उपयोग में इस प्रकार परिवर्तन करने की आवश्यकता है, ताकि कृषि एवं भूमि का अन्य उपयोग सुनिश्चित, सुव्यवस्थित एवं अधिक उत्पादन हो सके। इसके लिये कुछ संस्थागत सुधार, यथा- सड़क, उद्योग धन्धे, शिक्षा एवं प्रशिक्षण, सहकारिता आदि में सुधार आवश्यक है। इन सभी सुधारों के बाद ही चकबन्दी के बाद हुये भूमि उपयोग में परिवर्तनों का अधिकतम लाभ प्राप्त हो सकता है। इस प्रकार जनपद की आयोजना को प्राकृतिक आपदा नियन्त्रण, भूमि उपयोग में परिमार्जन, अवस्थापना तत्वों का विकास एवं सुधार पर ध्यान देना आवश्यक है।

 

प्राकृतिक समस्याओं के निवारण हेतु बाढ़ नियंत्रण:

नियोजन के प्रथम चरण में प्राकृतिक आपदाओं पर यथासम्भव नियन्त्रण अति आवश्यक है, क्योंकि इन प्राकृतिक आपदाओं द्वारा क्षेत्र का भूमि उपयोग ही नहीं, बल्कि अन्य अवस्थापना के तत्व एवं संरचनात्मक सुविधाएं भी दुष्प्रभावित होती हैं। इन प्राकृतिक आपदाओं के जल-जमाव, बाढ़, नदी मार्ग परिवर्तन, मृदा अपरदन आदि प्रमुख हैं। इन आपदाओं का सर्वाधिक प्रभाव कृषि कार्य पर पड़ता है, जो जनपद का प्रमुख आर्थिक आधार है। कभी-कभी तो इनका प्रभाव इतना विस्तृत होता है कि क्षेत्र में विपुल जन-धन की हानि होती है। इन सन्दर्भ में जल-प्रबन्ध, जल-प्रवाह की समुचित व्यवस्था, बाढ़ नियन्त्रण, मृदा उर्वरता नियन्त्रण तथा नदी मार्ग नियन्त्रण को सुनिश्चित करने की योजनाएं बनाना आवश्यक है, जिसके लिये निम्न सुझाव दिये जा सकते हैं-

 

(1)   जल प्रबन्ध

जनपद जौनपुर में प्रमुख आपदाओं में अति वृष्टि एवं सूखा प्रमुख है। अतः इस क्षेत्र की आयोजन के लिये जल निकास एवं जल प्रबन्ध की समुचित व्यवस्था नितान्त आवश्यक है, जिसके लिये अध्ययन क्षेत्र के छिछले तालों को गहरा करके अधिक जल धारणा की क्षमता उत्पन्न करना तथा कृत्रित तटबन्धों का निर्माण कर जलाशयों के रूप में इन्हें विकसित कर उन्हें विभिन्न प्रकार के उपयोगों के लिये तैयार करना उपयुक्त है। जनपद में कई उल्लेखनीय झीलें और ताल हैं, जो कुल क्षेत्रफल के 1.01 प्रतिशत भाग पर फैले हैं, इनमें शाहगंज में भरौली, गूजरताल, मानी नाला, आरा एवं धनापुर लवायन, जमुराई ताल, मड़ियाहूँ तहसील में मनकापुर, हसनपुर, जमुआ, दुहावर एवं मछलीशहर में अनेक छोटे-छोटे ताल हैं। इन जलाशयों को और गहरा करके तथा उनके चारों ओर के भागों के ऊँचा करके उनमें एकत्र करने की क्षमता में वृद्धि की जा सकती है। साथ ही साथ इन जलाशयों में मछली पालने, अधिक वर्षा के जल के संग्रह तथा मनोरंजन आदि की दृष्टि से बहुउद्देशीय बनाया जाना चाहिए। अध्ययन क्षेत्र का अधिकांश भाग गोमती-सई के दोआब में स्थित है। जहाँ प्रतिवर्ष बाढ़ की विभीषिका रहती है। बाढ़-नियंत्रण, जल निकास तथा नदी मार्ग परिवर्तन के निंयत्रण के फलस्वरूप प्राकृतिक विपदाओं से छुटकारा पाने के साथ-साथ भूमि एवं मृदा अपरदन की रोकथाम में सहायता होगी। इसके लिए तटबन्ध निर्माण एवं वनस्पतियों में अभिवृद्धि भी करनी होगी।

 

(भूमि उपयोग के वर्तमान स्वरूप में सुधार

भूमि उपयोग उद्देश्य प्रति हेक्टेयर उपज में अधिकाधिक वृद्धि का होना है। इसके लिए कृषि क्षेत्र एवं सकल कृषि क्षेत्र में वृद्धि एवं शस्य प्रतिरूप में परिवर्तन तथा वैज्ञानिक शस्य चक्र अपनाना आवश्यक है, जिसके परिणामस्वरूप कृषि क्षेत्र में वृद्धि के फलस्वरूप प्रति हेक्टेयर उत्पादन एवं कृषि में विशिष्टीकरण प्राप्त हो सकता है। अध्ययन क्षेत्र में कृषिगत भूमि अपेक्षाकृत अधिक है, लेकिन औसत उत्पादन कम होने के कारण पोषण स्तर सामान्य से कम है, साथ ही क्षेत्र की जनसंख्या के भरण पोषण के लिए खाद्यान्न उपलब्ध नहीं हो पाता है, इसलिए और अधिक कृषि उत्पादन के लिए शुद्ध कृषिगत भूमि की अपेक्षा सकल कृषिगत भूमि की वृद्धि अपेक्षित है, जो द्वि-बहुफसलीय भूमि में अभिवृद्धि करके ही सम्भव है। क्षेत्र में रबी एवं खरीफ फसलों के मध्य खेतों का परती रखना एक सामान्य बात है, जिसका मुख्य कारण सिंचाई के साधनों की अनुपलब्धता है, अतः शुष्क मौसम में सिंचाई की व्यवस्था पर्याप्त क्षेत्र को बहुफसली बनाया जा सकता है।

 

दुग्ध एवं पशुपालन

अध्ययन क्षेत्र में दुधारू पशुओं की संख्या कम नहीं है, लेकिन उनकी नस्ल निम्न कोटि की एवं अविकसित है, जिससे दुग्ध उत्पादन बहुत कम होता है। इसलिए इस क्षेत्र में उन्नत नस्ल के पशुओं के अतिरिक्त उनके स्वास्थ्य-सम्वर्धन, प्रजनन एवं उनकी देख-रेख के लिए सुचारू व्यवस्था आवश्यक है। पशुओं में महामारी (खुरपका, गलाघोंटू) आम बात है, जिसकी रोकथाम एवं उपचार की सुव्यवस्था होनी चाहिए। पशुओं के स्वास्थ्य, सम्वर्धन एवं प्रजनन से सम्बन्धित सुविधायें मात्र विकास खण्ड केन्द्रों तक ही सीमित है, जो प्रत्येक गाँव से औसतन 10 किलोमीटर से अधिक दूर स्थित है, जिसके फलस्वरूप सुदूर ग्रामीण अंचलों के कृषक इनका भरपूर लाभ नहीं उठा पाते हैं। अतः इन सेवाओं को औसतन प्रत्येक गाँव से 3 से 4 किलोमीटर के अन्दर उपलब्ध होना चाहिए। क्षेत्र में कुक्कुट, भेंड़, बकरी, सुअर पालन निम्न श्रेणी का कार्य समझा जाता है, इन पशुओं का पालन प्रायः निम्न एवं गरीब वर्ग के लोगों द्वारा किया जाता है, जबकि अधिकांशतः इनका उपयोग (माँस आदि) सभी जातियों द्वारा किया जाता है। वर्तमान समय में इनके पालन से आर्थिक प्रगति की जा सकती है। जनपद में सुअर एवं कुक्कुट पालन की सर्वाधिक सम्भावनाएं हैं, क्योंकि न्यूनतम लागत से अधिकतम लाभ प्राप्त किया जा सकता है। अतः इसके लिए उचित प्रोत्साहन की आवश्यकता है।

 

भूमि उपयोग के परिवर्तन हेतु आवश्यक सुविधाओं का प्रावधान

जनपद जौनपुर कृषि प्रधान क्षेत्र होने के बाद भी यहाँ अवस्थापनात्मक कारकों के समुचित विकास के अभाव के कारण अधिकतम लाभ नहीं प्राप्त हो पा रहा है। इसलिए भूमि उपयोग नियोजन में कृषि में आवश्यक विनियोगों की सम्पूर्ति एवं संरचनात्मक सुधार की एक समन्वित योजना प्रस्तुत करना आवश्यक है। इस सम्बन्ध में निम्न सुझाव प्रस्तुत किये जा सकते हैं।

 

सिंचन प्रणाली

भारत जैसे मानसूनी जलवायु वाले देश में कृषि के लिए सिंचाई एक आधारभूत आवश्यकता है। बिना सिंचाई के उन्नत बीजों एवं उर्वरकों का प्रयोग अलाभकारी होता है। क्षेत्र में शुद्ध कृषिगत भूमिका मात्र 70 प्रतिशत भाग सिंचित है, यही नहीं, यह सिंचन की सुविधा सम्पूर्ण जनपद में समान रूप से उपलब्ध नहीं है। अतः असिंचित क्षेत्र में गहन बहुफसली भूमि विकसित करना असम्भव है। जनपद में यद्यपि निजी नलकूपों की संख्या पर्याप्त है, जो धनी व्यक्तियों के पास सीमित है, नहर से सिंचाई की सुविधा अपर्याप्त एवं दोषपूर्ण है। राजकीय नलकूप से मात्र 5 प्रतिशत (12273 हेक्टेयर में) और नहर से 24.55 प्रतिशत (52369 हेक्टेयर) भूमि सिंचित है। अतः क्षेत्र में सिंचाई योजना के अन्तर्गत राजकीय नलकूपों की संख्या में वृद्धि आवश्यक है। नहरों का विकास करना होगा तथा साथ ही साथ सहकारी समितियों द्वारा गरीब किसानों को निजी नलकूप लगाने के लिए ऋण की सुविधा प्रदान करना आवश्यक है।

 

विद्युतीकरण और शक्ति के साधनों का विकास

अध्ययन क्षेत्र में नलकूपों, घरेलू कार्यों एवं अन्य औद्योगिक प्रतिष्ठानों के लिये विद्युत आपूर्ति होने पर भूमि उपयोग एवं आर्थिक विकास में क्रान्तिकारी परिवर्तन सकता है। क्षेत्र में 87 गांवों में विद्युतीकरण हो चुका है, तथा शेष ग्रामों का विद्युतीकृत योजना है। यद्यपि विद्युतीकरण की गति तीव्र है, परन्तु कृषि क्षेत्रों में औसत 10 से 14 घण्टे ही आपूर्ति होती है और वह भी अनियमित समय में। अतः कृषि क्षेत्रा में विद्युत आपूर्ति को सुनिश्चित कर नियमित करना परम् आवश्यक है। अध्ययन क्षेत्र में बायोगैस और गोबर गैस के विकास की पर्याप्त संभावना है।

 

कृषि यंत्रीकरण

अध्ययन क्षेत्र में विस्तृत पैमान पर उन्नत कृषि यंत्रों के प्रयोग नगण्य हैं। यद्यपि चकबन्दी योजना के परिणामस्वरूप जोतों के आकारों में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ है, परन्तु बड़े जोत वाले कृषक ही ट्रैक्टर, नलकूप, थ्रेसर तथा अन्य लघु कृषि यंत्रों का प्रयोग कर रहे हैं। यान्त्रिक कृषि पद्धति के विकास में सहकारी सहयोग महत्वपूर्ण है। विकास खण्ड अथवा सहकारी समिति के माध्यम से बड़े कृषि यंत्रों की सुविधा न्यूनतम किराये पर उपलब्ध होनी चाहिए। आज जनपद में कृषक मजदूरों की संख्या में निरन्तर कमी हो रही है, के सन्दर्भ में कृषि यंत्रीकरण वांछित ही नहीं, वरन् एक सामयिक आवश्यकता है।

 

परिवहन एवं सम्पर्क मार्ग

अध्ययन क्षेत्र में परिवहन एवं सम्पर्क मार्ग का अभाव है। ये साधन आर्थिक समृद्धि के लिये रक्त संचार की धमनियों के सदृश होते हैं। ग्रामीण सेवा केन्द्र सड़क मार्ग पर स्थित है, इसलिये चकबन्दी के बाद प्रस्तावित सड़कों एवं चकमार्गों की सुव्यवस्थित कर प्रत्येक ग्राम तक कम से कम कच्ची सड़क की सुविधा अवष्ष्य प्राप्त होनी चाहिए, इसके लिये सम्पर्क मार्गों का निर्माण एवं चक मार्गों का अनाधिकार समाप्त करना होगा। क्षेत्र में रेल मार्गों का विकास समुचित है, जो जनपद के आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण है।

 

औद्योगिक विकास

अध्ययन क्षेत्र में कृषि आधारित उद्योगों में खाड़सारी चावल, दाल, आॅटा, तेल मीलों के अतिरिक्त ग्राम्य स्तर पर दियासलाई, साबुन, मोमबत्ती तथा पशुओं पर आधारित चमड़ा, ऊन, दूध से सम्बन्धित वस्तुओं के निर्माण के लिए उद्योग लगाये जा सकते हैं।

 

संस्थागत सुधार

किसी क्षेत्र के विकास हेतु संस्थागत सुधार होना आवश्यक है, जिसमें तकनीकी वैज्ञानिक शिक्षा, प्रशिक्षण, शोध संस्थान, बैंकिंग सुविधा, मण्डी समितियाँ प्रमुख हैं।

 

निष्कर्ष:

अनुभवी योजनाविद् ‘‘अलवर्ट वाटरसन’’ ने ग्रामीण विकास को एक समाकलित बहुउद्देशीय प्रक्रिया कहा है, जिसमें कृषि विकास के साथ ही जन साधारण हेतु विभिन्न सामाजिक सुविधाओं का प्रावधान भी सम्मिलित होता है। कृषि विकास का मुख्य उद्देश्य कृषि उत्पादन में वृद्धि है, जबकि ग्रामीण विकास का प्रधान उद्देश्य ग्रामीणजन के सामाजिक, आर्थिक कल्याण को प्रोत्साहित करना होता है। इन्होंने ग्रामीण विकास और कृषि विकास हेतु एक माॅडल की रचना की है, जिसके अन्तर्गत 6 प्रधान तत्वों को सम्मिलित किया है, यथा - (1) श्रम शक्ति आश्रित गहन कृषि, (2) श्रम प्रधान लघु विकास कार्य, (3) कृषि पर आधारित लघु उद्योग, (4) स्थानीय सहयोग एवं आत्मनिर्भरता, (5) समुचित संस्थागत एवं संगठनात्मक व्यवस्था, (6) विकास केन्द्रों का एक पदानुक्रम। स्पष्ट है कि इस योजनाविद् का माॅडल भारतीय ग्रामीण विकास के नियोजन में महत्वपूर्ण है, बिना कृषि सुधार किये ग्रामीण विकास की परिकल्पना को चरितार्थ करना अति कठिन है। जनपद में अनुकूलतम भूमि उपयोग की स्थिति को प्राप्त करने में भौतिक कारकों के साथ-साथ मानवीय आर्थिक सामाजिक कारक भी अवरोधक हैं। क्षेत्र के विकास के लिए प्रमुख खाद्यानों एवं नगदी शस्यों को प्रमुखता देना और कृषि आधारित उद्योगों को बढ़ावा देना अधिक लाभप्रद सिद्ध होगा।

 

संदर्भ सूची

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3.       चैरसिया, महीप, 2018. सामाजिक-आर्थिक रूपांतरण एवं ग्रामीण विकासः जौनपुर जनपद का एक भौगोलिक अध्ययन, स्वीकृत शोध प्रस्ताव वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विष्वविद्यालय, जौनपुर। पे.नं.-6

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11.    जिला सांख्यिकीय पत्रिका जनपद जौनपुर

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Received on 20.02.2021         Modified on 11.03.2021

Accepted on 24.03.2021         © A&V Publication all right reserved

Int. J. Ad. Social Sciences. 2021; 9(1):67-72.